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Narson Development Festival

 

हफ्तों की तैयारी और लाखों का तामझाम धरा का धरा रहा; प्रधान, बीडीसी और आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों की भारी फौज के बावजूद सूना रहा पंडाल, कुप्रबंधन की तस्वीरों ने खोली पोल।

 

ग्रामीण तहकीकात/नवीन कुमार 

नारसन। विकास खंड नारसन के प्रांगण में मंगलवार को आयोजित सरकारी ‘महोत्सव’ विकास की नई इबारत लिखने के बजाय सफेद हाथी साबित हुआ। शासन-प्रशासन की ओर से ‘4 साल बेमिसाल’ और ‘जन-जन के द्वारा सरकार के द्वार’ जैसे लुभावने नारों के साथ हफ्तों से ढोल पीटा जा रहा था, लेकिन हकीकत में आज यहाँ बिछी सैकड़ों खाली कुर्सियाँ खुद अपनी बदहाली पर आंसू रोती दिखीं। करोड़ों के बजट और सरकारी अमले की भारी-भरकम फौज के बावजूद, जनता की गैर-मौजूदगी ने अफसरों के दावों की कलई खोल कर रख दी है। सवाल यह उठ रहा है कि जब ब्लॉक के सभी ग्राम प्रधान, बीडीसी (BDC) सदस्य और आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों की फौज तैनात थी, तो फिर वह ‘आम जनता’ कहाँ गायब थी जिसके नाम पर यह सारा तामझाम रचा गया?

ग्रामीणों के बीच दबी जुबान में चर्चा है कि जनता अब इन ‘कागजी मेलों’ और ‘बजट खपाऊ आयोजनों’ की असलियत समझ चुकी है। क्षेत्र की सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं और स्वास्थ्य सेवाएं खुद बीमार पड़ी हैं, ऐसे में जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को इस तरह वीरान पंडालों में बर्बाद करना क्या न्यायोचित है? मंच पर सजी खाली कुर्सियों की तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर ‘कुप्रबंधन’ की मिसाल बनकर वायरल हो रही हैं। बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि यही करोड़ों रुपया क्षेत्र के बुनियादी विकास पर खर्च होता, तो शायद आज प्रशासन को जनता के इंतजार में यूँ ‘सूनी आँखें’ नहीं बिछानी पड़तीं। अब देखना यह है कि इस ‘फ्लॉप शो’ के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कोई जवाबदेही तय होगी या फिर जनता की कमाई को यूँ ही ‘बेमिसाल’ बताकर कागजों में रफा-दफा कर दिया जाएगा।