
ग्रामीण तहकीकात / नवीन कुमार
नारसन। ग्रामीण विकास की रीढ़ कही जाने वाली रीप (REAP) परियोजना के नारसन ब्लॉक में चल रही खुली अंधेरगर्दी पर जब सूचना का अधिकार (RTI) का हंटर चला, तो अफसरों के होश फाख्ता हो गए और खुद उनके दस्तखत वाली चिट्ठी ने पूरे कारनामे का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया है। जिला कार्यालय ग्रामोत्थान (रीप), विकास भवन द्वारा जारी पत्रांक 375 में दर्ज आधिकारिक कुबूलनामे ने पूरे प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है, जिसमें साफ माना गया है कि ब्लॉक में तैनात किए गए कार्मिकों के चरित्र व पुलिस वेरिफिकेशन का कोई नामोनिशान तक विभाग की फाइलों में दर्ज नहीं है—यानी सरकारी खजाने की चाबी थमाने से पहले यह तक नहीं देखा गया कि कुर्सी पर बैठाया गया शख्स पाक-साफ है या दागदार। मजे की बात तो यह है कि कागजों पर महिला समूहों के नाम करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट व सब्सिडी की बंदरबांट दर्शा दी गई, लेकिन जब इस पूरे खेल के वार्षिक बैंक स्टेटमेंट, लेजर बुक, चार्टर्ड एकाउंटेंट (CA) की ऑडिट रिपोर्ट, चहेती फर्मों के भुगतान और देहरादून से खरीदे गए फूड कोर्ट के बिल-वाउचर तलब किए गए, तो सीधे जवाब देने की बजाय अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। बैंक खातों का पूरा हिसाब दबाकर रख लिया गया और गेंद निचले स्तर की सहकारिता व एनआरएलएम के पाले में फेंककर जिम्मेदारी से साफ पल्ला झाड़ लिया गया। कानूनी फंदे से बचने के लिए 30 दिन की मियाद बीत जाने पर बैकडेट (24 सितंबर) डालकर 3 अक्टूबर को डाक से भेजे गए इस भारी पुलिंदे का आलम यह है कि भेजे गए किसी भी कागज पर लोक सूचना अधिकारी के न तो कोई दस्तखत हैं और न ही कोई अधिकृत मुहर—जिससे यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या करोड़ों के बजट पर बैठा विभाग इतना लापरवाह और बेलगाम हो चुका है कि कानून की नजर में रद्दी सादे कागजों का बंडल थमाकर औपचारिकता पूरी समझ बैठा? सरकारी धन के इस संदिग्ध खेल, बैंक स्टेटमेंट दबाने और आधिकारिक पर्दाफाश के बाद अब मामला मुख्य विकास अधिकारी (CDO) की चौखट पर प्रथम अपील के जरिए पहुंच चुका है, जहां अब बैंक खातों के लेन-देन की जांच और लीपापोती करने वाले अफसरों पर सीधा विधिक शिकंजा कसना तय माना जा रहा है।
